NISAR सैटेलाइट क्या है: नासा और इसरो का नया मिशन कैसे करेगा काम
बादलों के पार देखने वाली आँख: क्या है NISAR सैटेलाइट?
- ►नासा और इसरो का संयुक्त पृथ्वी अवलोकन सैटेलाइट मिशन
- ►घने बादलों और रात के अंधेरे में भी साफ तस्वीरें लेने की तकनीक
- ►पैसिफिक नॉर्थवेस्ट क्षेत्र की नई रडार तस्वीरें की गईं जारी
- ►हिमालयी क्षेत्रों में भूस्खलन और आपदाओं की मिलेगी सटीक चेतावनी
- ►भारतीय किसानों के लिए मिट्टी की नमी और फसल चक्र को ट्रैक करना होगा आसान
मान लीजिए आप अपने स्मार्टफोन से पहाड़ों की एक खूबसूरत तस्वीर खींचना चाहते हैं, लेकिन आसमान में घने बादल छाए हुए हैं और कोहरा इतना है कि कुछ फीट दूर का भी नहीं दिख रहा। ज़ाहिर है, आपका कैमरा फेल हो जाएगा। अब ज़रा सोचिए, अंतरिक्ष में घूम रहे हमारे सैटेलाइट्स के साथ भी तो यही समस्या होती होगी। पृथ्वी का लगभग दो-तिहाई हिस्सा हमेशा बादलों से ढका रहता है। ऐसे में जब कहीं अचानक बाढ़ आती है, भूस्खलन होता है या ग्लेशियर टूटते हैं, तो आसमान में छाए बादल पारंपरिक सैटेलाइट्स के कैमरों को कुछ भी देखने नहीं देते।
इसी समस्या का समाधान खोजने के लिए अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने हाथ मिलाया है। दोनों एजेंसियों ने मिलकर तैयार किया है एक बेहद अनोखा खोजी उपकरण—'NISAR' (NASA-ISRO Synthetic Aperture Radar)। हाल ही में नासा के जेट प्रोपल्शन लैबोरेटरी (JPL) की रिपोर्ट के अनुसार, इस सैटेलाइट ने बादलों की मोटी परत को चीरते हुए पैसिफिक नॉर्थवेस्ट क्षेत्र की कुछ बेहद सटीक और विस्तृत तस्वीरें ली हैं। यह इस बात का सीधा प्रमाण है कि यह तकनीक आने वाले समय में हमारी धरती की निगरानी का पूरा तरीका बदलने जा रही है।
रडार इमेजिंग की अनोखी तकनीक: यह काम कैसे करती है?
आमतौर पर जो सैटेलाइट्स हम देखते हैं, वे सूर्य की रोशनी पर निर्भर करते हैं। उन्हें वैज्ञानिक भाषा में 'ऑप्टिकल सैटेलाइट' कहा जाता है। लेकिन NISAR एक 'एक्टिव रडार' सैटेलाइट है। इसे आप चमगादड़ के उड़ने के तरीके से समझ सकते हैं। जैसे चमगादड़ रात के अंधेरे में अपनी आवाज की तरंगें (अल्ट्रासोनिक वेव्स) छोड़ता है और उनके टकराकर वापस आने से रास्ते की बाधाओं को भांप लेता है, ठीक वैसे ही NISAR अपनी रडार तरंगें धरती की ओर भेजता है।
जब ये तरंगें जमीन, पेड़ों, बर्फ या पानी से टकराकर वापस सैटेलाइट के पास पहुंचती हैं, तो उनका विश्लेषण करके एक बेहद सटीक त्रि-आयामी (3D) नक्शा तैयार किया जाता है। चूंकि रडार तरंगों को बादलों, धुंध, पानी की बूंदों या रात के अंधेरे से कोई फर्क नहीं पड़ता, इसलिए यह सैटेलाइट चौबीसों घंटे और हर मौसम में लगातार काम कर सकता है।
एल-बैंड और एस-बैंड का अनोखा संगम
इस मिशन की सबसे बड़ी खासियत इसका 'डुअल-फ्रीक्वेंसी' रडार सिस्टम है। इसमें दो अलग-अलग तरह के रडार लगाए गए हैं: 1. L-band रडार: इसे अमेरिकी एजेंसी नासा ने तैयार किया है। इसकी तरंगें लंबी होती हैं, जो घने जंगलों की पत्तियों को पार कर पेड़ों के तनों और सीधे जमीन तक पहुंच सकती हैं। 2. S-band रडार: इसे भारतीय स्पेस एजेंसी इसरो ने विकसित किया है। यह छोटी तरंगदैर्ध्य (wavelength) पर काम करता है, जो भारी बारिश और तटीय इलाकों की मैपिंग के लिए बेहतरीन माना जाता है।जब ये दोनों रडार मिलकर काम करते हैं, तो पृथ्वी की सतह पर होने वाले सेंटीमीटर स्तर के बदलाव भी छिप नहीं पाते।
भारत के लिए क्यों गेम-चेंजर साबित होगा NISAR?
एक भारतीय नागरिक के रूप में हमारे मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि अमेरिका और भारत की इस जुगलबंदी से हमारे देश को सीधे तौर पर क्या फायदा होगा? दरअसल, भारत जैसी विकासशील और कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था के लिए यह मिशन किसी वरदान से कम नहीं है।
1. हिमालयी राज्यों में भूस्खलन से बचाव
उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर जैसे पहाड़ी राज्यों में रहने वाले लोग हर साल मानसून के दौरान लैंडस्लाइड (भूस्खलन) के डर में जीते हैं। कई बार पूरी की पूरी सड़कें और बस्तियाँ इसकी चपेट में आ जाती हैं। NISAR की मदद से वैज्ञानिक पहाड़ों की ढलानों पर मिट्टी और चट्टानों के खिसकने की रीयल-टाइम निगरानी कर सकेंगे। यदि किसी पहाड़ी पर कोई मामूली झुकाव या खिंचाव आता है, तो यह सैटेलाइट उसकी चेतावनी पहले ही दे देगा, जिससे समय रहते लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाया जा सकेगा।2. भारतीय किसानों की मदद और मानसून का पूर्वानुमान
भारत की आधी से अधिक आबादी आज भी खेती पर निर्भर है और हमारी खेती सीधे तौर पर मानसून के बादलों से जुड़ी है। ऑप्टिकल सैटेलाइट मानसून के दौरान बादलों के कारण खेतों की हालत नहीं देख पाते। लेकिन NISAR बादलों के पार जाकर सीधे मिट्टी की नमी (Soil Moisture) को माप सकता है। इससे यह पता लगाना आसान हो जाएगा कि किस क्षेत्र में सूखा पड़ने की आशंका है और कहाँ फसल की बुवाई के लिए सही समय आ गया है।पर्यावरण और वैश्विक जलवायु परिवर्तन पर नजर
ग्लोबल वार्मिंग के इस दौर में हमारे ग्लेशियर बहुत तेजी से पिघल रहे हैं। अंटार्कटिका से लेकर हिमालय की चोटियों तक, बर्फ की चादरें सिकुड़ती जा रही हैं। नासा की हालिया रिपोर्ट बताती है कि पैसिफिक नॉर्थवेस्ट के पहाड़ी इलाकों में बादलों के बावजूद इस सैटेलाइट ने बर्फ की मोटाई और उनके पिघलने की दर का सटीक डेटा जुटाया है।
यह डेटा पर्यावरणविदों के लिए बेहद कीमती है। इससे हम यह समझ पाएंगे कि समुद्र का जलस्तर कितनी तेजी से बढ़ रहा है और आने वाले दशकों में हमारे तटीय शहरों (जैसे मुंबई, चेन्नई और कोलकाता) पर इसका क्या असर पड़ सकता है।
वैज्ञानिक सहयोग की एक नई मिसाल
नासा और इसरो का यह साझा प्रयास केवल दो देशों का तकनीकी गठजोड़ नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रतीक है कि जब दुनिया की दो बड़ी वैज्ञानिक ताकतें एक साथ आती हैं, तो मानवता के कल्याण के लिए कितनी बड़ी खोजें संभव हो पाती हैं। इसरो के वैज्ञानिकों ने इस सैटेलाइट के कई महत्वपूर्ण हिस्सों को बेंगलुरू में तैयार किया है, जिसके बाद इसे अंतिम असेंबली और परीक्षण के लिए अमेरिकी लैब में भेजा गया। यह 'मेक इन इंडिया' और वैश्विक विज्ञान के तालमेल का एक बेहतरीन उदाहरण है।
आगे की राह और हमारी चुनौतियाँ
जैसे-जैसे हम अंतरिक्ष विज्ञान में आगे बढ़ रहे हैं, वैसे-वैसे डेटा को प्रोसेस करने की चुनौतियां भी बढ़ रही हैं। NISAR सैटेलाइट हर दिन भारी मात्रा में डेटा पृथ्वी पर भेजेगा। इस डेटा को सहेजने, उसका विश्लेषण करने और उससे सटीक भविष्यवाणियां करने के लिए हमारे युवा वैज्ञानिकों और डेटा विश्लेषकों को तैयार रहना होगा।
यह तकनीक हमारे हाथ में एक ऐसा सुपर-कैमरा देने जा रही है जिससे हम अपनी ही धरती को एक बिल्कुल नए नजरिए से देख पाएंगे। चाहे वह बंगाल की खाड़ी में उठने वाले चक्रवात हों या फिर मध्य भारत के जंगलों का घटता दायरा, अब कुछ भी हमारी नजरों से बच नहीं सकेगा।
आपको क्या लगता है, क्या नासा और इसरो का यह साझा मिशन भविष्य में प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले जान-माल के नुकसान को पूरी तरह से रोकने में सफल हो पाएगा? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें और इस वैज्ञानिक उपलब्धि पर चर्चा शुरू करें!
नासा और इसरो का संयुक्त प्रोजेक्ट NISAR सैटेलाइट अब बादलों के पार भी पृथ्वी की सतह पर होने वाले मामूली बदलावों को ट्रैक कर रहा है। जानिए भारत के लिए इसके मायने।