AI डेटासेट के लिए पुरानी किताबें नष्ट: क्या है पूरा मामला?
AI की भूख और किताबों का विनाश: क्या है नया विवाद?
- ►ऑस्ट्रेलियाई बुकसेलर्स ने AI ट्रेनिंग के लिए दुर्लभ किताबों के विनाश पर चिंता जताई है।
- ►उच्च गति स्कैनिंग के लिए किताबों की बाइंडिंग और रीढ़ को काट दिया जाता है।
- ►AI कंपनियां मॉडल सुधारने के लिए पुरानी और दुर्लभ पांडुलिपियों की ओर रुख कर रही हैं।
- ►डिजिटल डेटा और भौतिक विरासत के बीच संतुलन बनाने की मांग तेज हो गई है।
- ►भारतीय पांडुलिपियों और ऐतिहासिक ग्रंथों के गैर-विनाशकारी संरक्षण पर पड़ा प्रभाव।
जरा सोचिए, आपके हाथ में 100 साल पुरानी एक ऐसी किताब हो, जिसकी बाइंडिंग हाथ से की गई हो, जिसके पन्नों पर वक्त की अपनी खुशबू हो और जो दुनिया में बेहद कम बची हो। अब कल्पना कीजिए कि एक बड़ी टेक कंपनी का कर्मचारी उस दुर्लभ किताब की रीढ़ (spine) को आरी से काटकर अलग कर दे, ताकि उसके पन्ने एक मशीन में तेजी से घूम सकें और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का एक नया मॉडल हिंदी या अंग्रेजी सीख सके।
सुनने में यह किसी साइंस-फिक्शन फिल्म का खौफनाक दृश्य लग सकता है, लेकिन हाल ही में ऑस्ट्रेलियाई बुकसेलर्स और दुर्लभ पुस्तकों के विशेषज्ञों ने इस पर गंभीर चिंता जताई है। गार्जियन (The Guardian) की रिपोर्ट के अनुसार, AI डेटासेट तैयार करने के लिए दुर्लभ और अनमोल किताबों को शारीरिक रूप से नष्ट किया जा रहा है।
हम और आप हर दिन चैटजीपीटी या अन्य AI टूल का उपयोग करते हैं, लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि इन स्मार्ट उत्तरों के पीछे ज्ञान जुटाने की कीमत कौन चुका रहा है? आइए इस पूरे मामले को बारीकी से समझते हैं।
टेक कंपनियों को पुरानी किताबों की जरूरत क्यों पड़ी?
पिछले कुछ वर्षों में AI मॉडल्स जैसे लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स (LLMs) को ट्रेन करने के लिए इंटरनेट का अधिकांश पब्लिक डेटा इस्तेमाल किया जा चुका है। सोशल मीडिया पोस्ट, विकिपीडिया और न्यूज आर्टिकल्स से AI ने काफी कुछ सीख लिया। लेकिन अब टेक कंपनियों के सामने एक बड़ी चुनौती है—'डेटा क्वालिटी'।
इंटरनेट पर उपलब्ध अधिकांश नया डेटा AI-जनरेटेड है या उसमें व्याकरण और ज्ञान की गुणवत्ता कम है। AI को अधिक समझदार, ऐतिहासिक रूप से सटीक और समृद्ध भाषा सिखाने के लिए कंपनियों को ऐसी सामग्री चाहिए जो इंटरनेट पर आसानी से उपलब्ध नहीं है। इसके लिए सदियों पुरानी, आउट-ऑफ-प्रिंट (जो अब नहीं छपतीं) और दुर्लभ किताबें सबसे बड़ा खजाना बनकर उभरी हैं।
समस्या यह नहीं है कि AI पुरानी किताबों से सीख रहा है। समस्या वह तरीका है जिससे इन किताबों को डिजिटल रूप दिया जा रहा है।
विनाशकारी स्कैनिंग (Destructive Scanning) क्या है?
जब किसी किताब को डिजिटल रूप में बदलना होता है, तो दो रास्ते होते हैं:
1. गैर-विनाशकारी स्कैनिंग (Non-Destructive Scanning): इसमें किताब को बिना नुकसान पहुंचाए पन्ना-दर-पन्ना हाथ से या विशेष ओवरहेड कैमरों से स्कैन किया जाता है। यह सुरक्षित है, लेकिन इसमें बहुत समय और पैसा लगता है। 2. विनाशकारी स्कैनिंग (Destructive Scanning): इसमें किताब की बाइंडिंग को पूरी तरह से काट दिया जाता है। अलग-अलग हुए पन्नों को एक हाई-स्पीड ऑटोमैटिक शीट-फीडर मशीन में डाल दिया जाता है। यह मशीन प्रति मिनट सैकड़ों पन्नों को स्कैन कर लेती है।
AI कंपनियों के लिए काम करने वाले डेटा एग्रीगेटर्स गति और कम लागत के चक्कर में दूसरे तरीके को अपना रहे हैं। जब एक दुर्लभ किताब की बाइंडिंग कट जाती है, तो वह भौतिक रूप से हमेशा के लिए नष्ट हो जाती है।
बुकसेलर्स का गुस्सा: 'यह केवल शब्द नहीं, इतिहास है'
ऑस्ट्रेलियाई बुकसेलर्स एसोसिएशन और एंटीक्वेरियन बुक एक्सपर्ट्स ने इस चलन को 'विनाशकारी' और 'दर्दनाक' करार दिया है। उनका कहना है कि एक दुर्लभ किताब सिर्फ उसके भीतर लिखे शब्द नहीं होते। उसका कागज, उसकी बाइंडिंग की कारीगरी, पन्नों पर लिखे पुराने पाठकों के नोट और उसकी ऐतिहासिक स्थिति अपने आप में कला और इतिहास का हिस्सा हैं।
जब एक बार वह भौतिक पुस्तक नष्ट हो जाती है, तो उस दौर की छपाई और शिल्पकला का एक टुकड़ा हमेशा के लिए गायब हो जाता है। डिजिटल स्कैन उस पन्ने का केवल टेक्स्ट रख सकता है, लेकिन उसकी भौतिक आत्मा को नहीं सहेज सकता।
क्या एक बेहतर AI मॉडल बनाने के लिए मानव इतिहास की भौतिक निशानियों को नष्ट करना जायज है? यह सवाल आज पूरी दुनिया के विचारकों और वैज्ञानिकों के सामने खड़ा है।
भारत के लिए इसके क्या मायने हैं?
यह खबर केवल ऑस्ट्रेलिया या पश्चिमी देशों तक सीमित नहीं है। भारत के दृष्टिकोण से इसके बहुत बड़े और गंभीर संकेत हैं।
1. भारतीय पांडुलिपियों और दुर्लभ ग्रंथों की सुरक्षा
भारत में लाखों की संख्या में प्राचीन पांडुलिपियां, ताड़पत्र के ग्रंथ और औपनिवेशिक काल की दुर्लभ पुस्तकें मौजूद हैं। भारतीय राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन (National Mission for Manuscripts) जैसी संस्थाएं वर्षों से इनके संरक्षण में लगी हैं। जैसे-जैसे इंडिक AI (Indic AI) मॉडल्स की मांग बढ़ेगी, भारतीय भाषाओं के ऐतिहासिक डेटा की मांग भी आसमान छुएगी। अगर भारत में स्कैनिंग के मानकों को कड़ा नहीं किया गया, तो हमारी दुर्लभ पांडुलिपियां भी ऐसे व्यापारिक एग्रीगेटर्स के निशाने पर आ सकती हैं।2. भारतीय AI रिसर्चर्स के लिए सही दिशा
भारत में जब हम अपनी भाषाओं के लिए एआई विकसित कर रहे हैं, तो हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि डेटा संग्रह का तरीका नैतिक हो। हमारे शोधकर्ताओं और एआई डेवलपर्स को गैर-विनाशकारी डिजिटलीकरण तकनीकों को प्राथमिकता देनी होगी। डिजिटल ज्ञान का निर्माण सांस्कृतिक धरोहर की कीमत पर नहीं होना चाहिए।तकनीक और परंपरा के बीच संतुलन कैसे बने?
प्रौद्योगिकी का उद्देश्य मानव सभ्यता को आगे बढ़ाना है, न कि उसके अतीत को मिटाना। एआई और बुक प्रिजर्वेशन के बीच एक स्वस्थ संतुलन बनाने के लिए विशेषज्ञों ने कुछ सुझाव दिए हैं:
निष्कर्ष: भविष्य की तकनीक और इतिहास की रक्षा
डिजिटल क्रांति और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस निसंदेह हमारे जीवन को आसान बना रहे हैं। लेकिन अगर हम एक बेहतर भविष्य बनाने की होड़ में अपने अतीत के भौतिक अवशेषों को नष्ट कर देंगे, तो वह प्रगति अधूरी ही कहलाएगी। एक दुर्लभ किताब सिर्फ जानकारी का जरिया नहीं है, वह मानव इतिहास का एक गवाह है।
हमें एक समाज के रूप में यह तय करना होगा कि AI को बुद्धिमान बनाने की प्रक्रिया नैतिक और टिकाऊ हो। डिजिटल ज्ञान हासिल करने के लिए किताबों को काटना किसी भी दृष्टिकोण से समझदारी नहीं कहा जा सकता।
क्या आपको लगता है कि AI डेटासेट बनाने के लिए दुर्लभ किताबों की विनाशकारी स्कैनिंग पर पूरी तरह से प्रतिबंध होना चाहिए? अपनी राय नीचे कमेंट्स में जरूर शेयर करें!
AI मॉडल्स को ट्रेन करने के लिए दुर्लभ और पुरानी किताबों को काटकर स्कैन करने की घटना पर ऑस्ट्रेलियाई बुकसेलर्स ने चिंता जताई है। जानें इस विवाद और भारतीय विरासत पर इसके असर की पूरी रिपोर्ट।