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Nasscom AI Court Draft: अदालतों में AI इस्तेमाल के नियम

Nasscom AI Court Draft: अदालतों में AI इस्तेमाल के नियम

कल्पना कीजिए कि एक जज के सामने किसी पेचीदा मामले की 5,000 पन्नों से ज्यादा की फाइल रखी है। हर पन्ने में दर्जनों गवाहियां, पुराने कानून और दशकों पुराने अदालती फैसले शामिल हैं। किसी साधारण इंसान के लिए इन तमाम दस्तावेजों को ध्यान से पढ़ने और उनके आधार पर नोट्स बनाने में हफ्तों का समय लग सकता है। लेकिन अगर एक डिजिटल असिस्टेंट इसी काम को महज कुछ सेकंड में कर दे और जज साहब के सामने सटीक समरी रख दे, तो क्या होगा?

💡 मुख्य बातें (Key Highlights)
  • नेस्कॉम ने अदालतों में एआई उपयोग के लिए ड्राफ्ट रेगुलेशन जारी किया।
  • एआई केवल कानूनी रिसर्च और दस्तावेज समरी में सहायक की भूमिका निभाएगा।
  • फैसला सुनाने का अंतिम अधिकार पूरी तरह मानव न्यायाधीशों के पास रहेगा।
  • डेटा प्राइवेसी और अल्गोरिदम के पक्षपात (Bias) को रोकने पर विशेष जोर।
  • भारतीय न्याय प्रणाली और लीगल-टेक स्टार्टअप्स के लिए स्पष्ट रोडमैप।

क्या आपने कभी सोचा है कि जब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) हमारे स्मार्टफोन, गाड़ियों और ऑफिस का काम संभाल रहा है, तो हमारी न्याय प्रणाली इससे दूर कैसे रह सकती है? जुलाई 2026 में नेस्कॉम (Nasscom) ने 'ड्राफ्ट रेगुलेशन फॉर यूज ऑफ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इन कोर्ट्स' (Draft Regulation for Use of Artificial Intelligence in Courts) पेश किया है। यह पहल भारतीय अदालतों में एआई के सुरक्षित, पारदर्शी और जिम्मेदार उपयोग के लिए एक बड़ा मील का पत्थर मानी जा रही है।

आइए विस्तार से समझते हैं कि नेस्कॉम का यह ड्राफ्ट क्या है, यह न्याय व्यवस्था को कैसे बदलेगा और एक आम भारतीय के जीवन पर इसका क्या असर पड़ेगा।

क्या है नेस्कॉम का एआई इन कोर्ट्स ड्राफ्ट?

टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री की शीर्ष संस्था नेस्कॉम ने अदालती कामकाज में एआई टूल्स के इस्तेमाल को विनियमित करने के लिए यह मसौदा तैयार किया है। इस ड्राफ्ट का मुख्य उद्देश्य अदालतों को आधुनिक बनाना है, बिना न्याय की मौलिक आत्मा और मानवीय संवेदनशीलता से समझौता किए।

हाल के वर्षों में कई वकीलों और जजों ने केस रिसर्च, ड्राफ्टिंग और ट्रांसक्रिप्शन के लिए लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स (LLMs) का इस्तेमाल शुरू किया है। हालांकि, बिना किसी तय नियम के एआई का उपयोग कई जोखिम भी खड़े करता है—जैसे कि एआई हॉलुसिनेशन (गलत या फर्जी केस लॉ बना देना), डेटा लीक और अल्गोरिदम में छिपा पक्षपात। नेस्कॉम का यह ड्राफ्ट इन्हीं चुनौतियों से निपटने के लिए एक सुरक्षा घेरा तैयार करता है।

सरल शब्दों में समझिए: डिजिटल रिसर्च असिस्टेंट की तरह काम

इसे एक आसान उदाहरण से समझते हैं। आप एआई को एक बेहद काबिल डिजिटल रिसर्च असिस्टेंट या लॉ क्लर्क मान सकते हैं। यह असिस्टेंट आलमारी से तुरंत सही किताब निकालकर ला सकता है, पन्ने पलटकर प्रासंगिक पैराग्राफ हाइलाइट कर सकता है और आपको उसका संक्षिप्त सार दे सकता है। लेकिन फैसला क्या सुनाना है, गवाह पर विश्वास करना है या नहीं—यह निर्णय केवल और केवल जज का होता है। नेस्कॉम का फ्रेमवर्क इसी सीमा रेखा को कानूनी रूप से तय करता है।

ड्राफ्ट रेगुलेशन के मुख्य स्तंभ और प्रावधान

नेस्कॉम द्वारा प्रस्तावित इस ढांचे में मुख्य रूप से चार सिद्धांतों पर ध्यान केंद्रित किया गया है:

1. 'ह्यूमन-इन-द-लूप' और अंतिम जवाबदेही

ड्राफ्ट का सबसे पहला और अनिवार्य नियम यह है कि एआई कभी भी अंतिम निर्णयकर्ता नहीं हो सकता। किसी भी मामले में आदेश या फैसला सुनाने की जिम्मेदारी हमेशा मानव न्यायाधीश (Human Judge) की होगी। एआई केवल निर्णय लेने की प्रक्रिया में सहायता प्रदान करेगा, न कि स्वयं निर्णय लेगा।

2. पारदर्शिता और कारण बताने की अनिवार्यता (Explainability)

यदि कोई जज या वकील किसी एआई टूल द्वारा दी गई जानकारी या समरी का उपयोग करता है, तो यह पारदर्शी होना चाहिए। एआई मॉडल ने किसी निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए किस डेटा का इस्तेमाल किया, इसका रिकॉर्ड उपलब्ध होना चाहिए। इसे ब्लैक-बॉक्स मॉडल की तरह इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं होगी।

3. डेटा गोपनीयता और सुरक्षा

न्यायालयों में आने वाले मामलों में अक्सर नागरिकों की बेहद संवेदनशील और व्यक्तिगत जानकारी शामिल होती है। फ्रेमवर्क में यह स्पष्ट किया गया है कि कोर्ट के डेटा को किसी भी सार्वजनिक या ओपन एआई मॉडल के ट्रेनिंग सेट में नहीं डाला जाएगा। इसके लिए क्लोज्ड-लूप और एनक्रिप्टेड सिस्टम का इस्तेमाल करना अनिवार्य होगा।

4. पक्षपात (Bias) और एआई हॉलुसिनेशन से बचाव

एआई मॉडल अतीत के डेटा पर प्रशिक्षित होते हैं, जिससे उनमें सामाजिक या ऐतिहासिक पक्षपात होने का खतरा रहता है। ड्राफ्ट में मांग की गई है कि न्याय प्रणाली में इस्तेमाल होने वाले सभी एआई टूल्स का नियमित ऑडिट किया जाए ताकि वे किसी जाति, धर्म, लिंग या वर्ग के प्रति पक्षपाती व्यवहार न करें।

भारत और भारतीय न्याय प्रणाली पर असर

भारतीय संदर्भ में यह विकास अत्यधिक महत्वपूर्ण है। भारत में लंबित मुकदमों की संख्या हमेशा एक बड़ी चिंता का विषय रही है। ऐसे में एआई तकनीक और उसका सही नियमन एक बड़ा बदलाव ला सकता है।

1. लंबित मामलों के निपटारे में तेजी

भारतीय अदालतों में लाखों मामले लंबित हैं, जिनमें से एक बड़ा हिस्सा केवल प्रक्रियात्मक कागजी कार्रवाई और दस्तावेज सत्यापन के कारण अटका रहता है। एआई की मदद से केस फाइलों को तुरंत श्रेणीबद्ध किया जा सकता है, जिससे शुरुआती सुनवाई का समय काफी घट जाएगा। इससे आम नागरिकों को तारीख पर तारीख मिलने की समस्या से राहत मिल सकती है।

2. भारतीय लीगल-टेक और टेक डेवलपर्स के लिए नए अवसर

नेस्कॉम के इस फ्रेमवर्क से भारत के लीगल-टेक स्टार्टअप्स और सॉफ्टवेयर इंजीनियरों को एक स्पष्ट दिशा मिली है। अब भारतीय डेवलपर्स ऐसे स्वदेशी एआई टूल्स विकसित कर सकते हैं जो सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट और जिला अदालतों की भाषाई विविधताओं (जैसे हिंदी, तमिल, मराठी आदि) के अनुकूल हों। उच्चतम न्यायालय के 'सुवास' (SUVAS) और 'सुपेस' (SUPACE) जैसे एआई पहलों को भी इस नए फ्रेमवर्क से मजबूती मिलेगी।

क्या हैं संभावित चुनौतियाँ?

किसी भी नई तकनीक को अपनाने में चुनौतियाँ भी शामिल होती हैं। अदालतों में एआई लागू करने के रास्ते में सबसे बड़ी चुनौती देश भर के वकीलों और न्यायिक अधिकारियों को इसके प्रति प्रशिक्षित करना है।

दूसरी बड़ी चुनौती यह है कि बड़े शहरों के कॉरपोरेट वकीलों और छोटे जिलों के वकीलों के बीच डिजिटल खाई न बने। सभी के पास समान और निष्पक्ष रूप से सुरक्षित एआई टूल्स की पहुँच होनी चाहिए। इसके अलावा, साइबर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम जरूरी हैं ताकि कोर्ट का डेटा हैकर्स के हाथों में न पड़े।

भविष्य की राह: तकनीक और न्याय का संतुलन

नेस्कॉम द्वारा तैयार किया गया यह ड्राफ्ट रेगुलेशन इस बात का प्रमाण है कि भारत एआई के प्रति केवल एक उपभोक्ता का रुख नहीं अपना रहा, बल्कि इसके जिम्मेदार नियमन में भी अग्रणी भूमिका निभा रहा है। तकनीक का काम इंसान को बदलना नहीं, बल्कि इंसान की क्षमताओं को बढ़ाना है।

जब न्याय प्रणाली में एआई का प्रयोग सख्त नियमों और मानवीय निगरानी के साथ होगा, तो न केवल हमारी अदालतों का काम तेज होगा, बल्कि कानून पर आम जनता का भरोसा भी और मजबूत होगा।

आपको क्या लगता है? क्या अदालतों में एआई का उपयोग शुरू होने से आम जनता को जल्दी न्याय मिल सकेगा, या आपको डेटा की गोपनीयता को लेकर कोई चिंता महसूस होती है? अपने विचार नीचे कमेंट सेक्शन में जरूर शेयर करें!

नेस्कॉम ने अदालतों में एआई के सुरक्षित और पारदर्शी उपयोग के लिए ड्राफ्ट रेगुलेशन पेश किया है। जानिए कैसे यह भारतीय न्याय प्रणाली को तेज और आधुनिक बनाएगा।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
❓ क्या नेस्कॉम के इस ड्राफ्ट के बाद एआई खुद फैसले सुना सकेगा?
जी नहीं, ड्राफ्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि एआई कभी भी अंतिम निर्णयकर्ता नहीं होगा। 'ह्यूमन-इन-द-लूप' (Human-in-the-loop) सिद्धांत के तहत न्याय और निर्णय देने का अधिकार केवल मानव न्यायाधीशों के पास ही रहेगा।
❓ अदालतों में एआई का मुख्य काम क्या होगा?
एआई का मुख्य काम हजारों पन्नों की केस फाइलों को समराइज करना, कानूनी नजीरों (Precedents) को खोजना, अदालती कार्यवाही का रियल-टाइम ट्रांसक्रिप्शन करना और दस्तावेजों के अनुवाद में मदद करना होगा।
❓ डेटा गोपनीयता को लेकर इस फ्रेमवर्क में क्या कहा गया है?
फ्रेमवर्क के अनुसार अदालत के संवेदनशील डेटा या मुकदमों की जानकारी को पब्लिक या ओपन-सोर्स एआई मॉडल्स के ट्रेनिंग डेटा में इस्तेमाल करने पर रोक का सुझाव दिया गया है।
❓ भारतीय आम नागरिकों को इससे क्या फायदा होगा?
मामलों के कागजी काम में तेजी आने से मुकदमों के निपटारे की रफ्तार बढ़ेगी, जिससे अदालतों में लंबित मामलों का बोझ कम होगा और आम जनता को त्वरित न्याय मिल सकेगा।
📚 स्रोत / References
यह लेख ऊपर दिए गए स्रोतों की रिपोर्टिंग पर आधारित है।
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Last Updated: जुलाई 24, 2026
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Author Bio

Rohit Kumar

✍️ रोहित कुमार

साइंटिफिक कम्युनिकेटर | एडिटोरियल डायरेक्टर

Vigyan Ki Duniya के संस्थापक। 400+ शोध-आधारित लेखों के साथ विज्ञान और टेक्नोलॉजी को सरल हिंदी में समझाते हैं। सस्टेनेबल इनोवेशन और डेटा-संचालित रिपोर्टिंग में विशेषज्ञ।