Breaking

AI से एंटीबायोटिक खोज: बारज़िले और कोलिन्स को प्रित्जकर पुरस्कार

AI से एंटीबायोटिक खोज: बारज़िले और कोलिन्स को प्रित्जकर पुरस्कार

जब दवाएं काम करना बंद कर दें: आधुनिक चिकित्सा का सबसे बड़ा संकट

💡 मुख्य बातें (Key Highlights)
  • ►MIT के वैज्ञानिकों रेजिना बारज़िले और जिम कोलिन्स को प्रित्जकर प्राइज मिला।
  • ►यह सम्मान डीप लर्निंग आधारित एंटीबायोटिक दवाओं की खोज के लिए दिया गया।
  • ►पारंपरिक ड्रग स्क्रीनिंग के दशकों लंबे काम को AI ने कुछ हफ्तों में बदला।
  • ►सुपरबग्स के बढ़ते खतरे से निपटने में नई दवाओं का निर्माण आसान होगा।
  • ►भारत में एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस के खिलाफ शोध को इस तकनीक से गति मिलेगी।

सोचिए, क्या हो अगर एक छोटा सा घाव या साधारण बुखार किसी भी मौजूदा दवा से ठीक न हो? अस्पताल के आईसीयू में मरीज हो, डॉक्टर के पास दुनिया भर की दवाएं हों, लेकिन कोई भी गोली या इंजेक्शन बैक्टीरिया को छू भी न पाए। यह कोई काल्पनिक डरावनी कहानी नहीं है, बल्कि दुनिया भर के अस्पतालों में डॉक्टरों द्वारा रोज झेली जा रही कड़वी सच्चाई है। इसे चिकित्सा विज्ञान की भाषा में एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) यानी दवाओं के प्रति बैक्टीरिया की प्रतिरोधक क्षमता कहा जाता है।

पारंपरिक रूप से एक नई एंटीबायोटिक दवा खोजने में 10 से 15 साल का समय और अरबों डॉलर का खर्च आता है। दवा कंपनियों के वैज्ञानिक पेट्री डिश में लाखों रासायनिक यौगिकों को एक-एक करके परखते हैं, तब जाकर शायद कोई एक अणु काम का निकलता है। लेकिन जब बैक्टीरिया तेजी से म्यूटेट होकर सुपरबग बन रहे हों, तब क्या हमारे पास 15 साल का समय है? बिल्कुल नहीं। इसी गतिरोध को तोड़ने के लिए मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) के दो शीर्ष शोधकर्ताओं ने एक नया रास्ता चुना, जिसे अब वैश्विक स्तर पर सबसे बड़ा वैज्ञानिक सम्मान मिला है।

रेजिना बारज़िले और जिम कोलिन्स: प्रित्जकर प्राइज से सम्मान

एमआईटी (MIT) के प्रोफेसर रेजिना बारज़िले और जिम कोलिन्स को उनके ऐतिहासिक कार्य 'AI-इनेबल्ड एंटीबायोटिक डिस्कवरी' के लिए 'प्रित्जकर प्राइज फॉर एआई एंड साइंस रिसर्च एक्सीलेंस' से सम्मानित किया गया है। यह पुरस्कार विज्ञान और चिकित्सा के क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के सबसे प्रभावी और युगांतरकारी उपयोग को मान्यता देता है।

रेजिना बारज़िले एमआईटी में कंप्यूटर साइंस और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस लैबोरेट्री (CSAIL) में एआई की प्रमुख शोधकर्ता हैं, जबकि जिम कोलिन्स बायोइंजीनियरिंग और सिंथेटिक बायोलॉजी के जाने-माने वैज्ञानिक हैं। इन दोनों वैज्ञानिकों ने यह साबित कर दिया कि जब एडवांस्ड कंप्यूटर साइंस और बायोलॉजी हाथ मिलाते हैं, तो वह काम हफ्तों में हो सकता है जिसे करने में दशकों लग जाते थे।

प्रित्जकर पुरस्कार समिति ने रेखांकित किया कि इन दोनों वैज्ञानिकों का शोध सिर्फ कागजी मॉडल नहीं है, बल्कि इसने वास्तविक लैब परीक्षणों में ऐसे नए एंटीबायोटिक अणुओं की पहचान की है जो उन बैक्टीरिया को भी खत्म करने में सक्षम पाए गए हैं, जिन पर लगभग सभी पारंपरिक दवाएं बेअसर हो चुकी थीं।

एआई ने कैसे खोजी नई एंटीबायोटिक? समझिए पूरी तकनीक

पारंपरिक दवा खोज प्रक्रिया को आप ऐसे समझ सकते हैं जैसे किसी विशाल रेगिस्तान में रेत छानकर सोने की एक सुई तलाशना। वैज्ञानिकों को यह अंदाजा लगाना पड़ता था कि कौन सा रासायनिक ढांचा बैक्टीरिया की कोशिका भित्ति या उसके प्रोटीन संश्लेषण को रोक सकता है। इसमें ज्यादातर समय उन पुराने फॉर्मूलों में ही थोड़ा फेरबदल किया जाता था जो पहले से ज्ञात थे। नतीजा यह हुआ कि दशकों से दुनिया को किसी बिल्कुल नए वर्ग (New Class) की एंटीबायोटिक नहीं मिल सकी थी।

बारज़िले और कोलिन्स की टीम ने इस समस्या को हल करने के लिए डीप न्यूरल नेटवर्क का सहारा लिया:

1. आणविक संरचना का डिजिटल प्रशिक्षण

शोधकर्ताओं ने एआई मॉडल को हजारों ऐसे रासायनिक अणुओं का डेटा दिया जिनकी संरचना और बैक्टीरिया पर उनके असर का रिकॉर्ड पहले से मौजूद था। मॉडल ने सीखा कि अणु के कौन से परमाणु और रासायनिक बंधन बैक्टीरिया के विकास को रोकने में मददगार होते हैं।

2. लाखों अणुओं की वर्चुअल स्क्रीनिंग

इसके बाद इस प्रशिक्षित एआई मॉडल को 100 मिलियन (10 करोड़) से अधिक रासायनिक यौगिकों के डिजिटल डेटाबेस में उतारा गया। जहां इंसानी लैब में कुछ हजार अणुओं को जांचने में महीनों लग जाते, वहीं एआई मॉडल ने कुछ ही दिनों में उन सभी 10 करोड़ अणुओं का विश्लेषण पूरा कर दिया।

3. मानव कोशिकाओं के लिए गैर-विषाक्त अणुओं का चयन

मॉडल को केवल यह नहीं देखना था कि अणु बैक्टीरिया को मारे, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना था कि वह इंसानी कोशिकाओं के लिए जहरीला न हो। एआई ने ऐसे अणुओं को छांटा जो पारंपरिक एंटीबायोटिक्स से बनावट में पूरी तरह अलग थे, ताकि बैक्टीरिया उनके खिलाफ पहले से तैयार न हों। इस तरह वैज्ञानिकों को ऐसे पूरी तरह नए यौगिक मिले, जो दवा-प्रतिरोधी बैक्टीरिया की दीवारों को भेदने में सक्षम थे।

चिकित्सा जगत के सामने सुपरबग्स की चुनौती

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) कई वर्षों से आगाह कर रहा है कि एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस दुनिया के शीर्ष वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य खतरों में से एक है। यदि नई दवाएं नहीं खोजी गईं, तो अनुमान है कि वर्ष 2050 तक सुपरबग्स के कारण हर साल एक करोड़ से अधिक लोगों की जान जा सकती है।

समस्या की जड़ यह है कि दवा कंपनियां नई एंटीबायोटिक्स पर भारी निवेश करने से बचती रही हैं। रक्तचाप या मधुमेह की दवा मरीज जिंदगी भर खाता है, जिससे कंपनियों को लगातार मुनाफा होता है। इसके विपरीत, एंटीबायोटिक का कोर्स महज 5 से 7 दिनों का होता है, और डॉक्टर नई एंटीबायोटिक को हमेशा आखिरी विकल्प के रूप में बचाकर रखते हैं ताकि उसका प्रतिरोध न बने। ऐसे में दवा कंपनियों के लिए अरबों डॉलर लगाकर नई एंटीबायोटिक बनाना आर्थिक रूप से घाटे का सौदा बन गया था।

बारज़िले और कोलिन्स का यह एआई तरीका इसी आर्थिक और वैज्ञानिक बाधा को दूर करता है। जब दवा खोजने की लागत और समय 90 प्रतिशत तक कम हो जाएगा, तो शोध संस्थानों और बायोटेक स्टार्टअप्स के लिए भी नए एंटीबायोटिक्स बनाना संभव हो सकेगा।

भारत के लिए इस तकनीक के सीधे मायने

भारत के संदर्भ में यह वैज्ञानिक उपलब्धि केवल एक अंतरराष्ट्रीय खबर नहीं, बल्कि हमारे सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए सीधा समाधान साबित हो सकती है। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

1. भारतीय अस्पतालों में सुपरबग्स का दबाव

भारत दुनिया में एंटीबायोटिक्स के सबसे बड़े उपभोक्ताओं में से एक है। बिना डॉक्टर की पर्ची के ओवर-द-काउंटर दवाएं लेने और अधूरा कोर्स छोड़ने की आदतों के कारण भारतीय उपमहाद्वीप में 'क्लेबसिएला न्यूमोनिया', 'एसिनेटोबैक्टर बॉमनाई' और मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट टीबी (MDR-TB) जैसे सुपरबग्स का प्रसार बहुत तेजी से हुआ है। हमारे अस्पतालों के आईसीयू में अक्सर डॉक्टर ऐसे मरीजों से जूझते हैं जहां कोई भी एंटीबायोटिक काम नहीं करती। एआई से खोजी जाने वाली नई दवाएं इन असाध्य संक्रमणों के इलाज में संजीवनी बन सकती हैं।

2. भारतीय वैज्ञानिक और फार्मा उद्योग की क्षमता

भारत को 'दुनिया की फार्मेसी' कहा जाता है। हमारे पास सीएसआईआर (CSIR), आईसीएमआर (ICMR) और आईआईएससी (IISc) जैसे विश्वस्तरीय अनुसंधान केंद्र हैं, साथ ही दुनिया का सबसे बड़ा जेनेरिक दवा उद्योग भी है। यदि भारतीय शोधकर्ता ओपन-सोर्स एआई टूल्स और डीप लर्निंग मॉडल्स को अपनी रासायनिक लैब्स के साथ जोड़ते हैं, तो भारत बहुत कम खर्च में स्वदेशी एंटीबायोटिक दवाओं की खोज में वैश्विक लीडर बन सकता है।

भविष्य की राह: क्या एआई पूरी तरह डॉक्टरों की जगह लेगा?

यहाँ यह समझना जरूरी है कि एआई अपने आप में कोई दवा नहीं बनाता; वह सिर्फ सबसे सटीक रास्ते की पहचान करता है। एआई द्वारा चुने गए संभावित अणुओं को अंततः रसायनज्ञों द्वारा लैब में सिंथेसाइज करना पड़ता है, चूहों और अन्य मॉडलों पर उनका प्री-क्लिनिकल परीक्षण होता है, और फिर इंसानों पर सुरक्षा व प्रभावकारिता जांचने के लिए तीन चरणों के क्लिनिकल ट्रायल होते हैं।

लेकिन एआई ने उस सबसे बड़े रोड़े को हटा दिया है जहां वैज्ञानिक सालों तक अंधेरे में तीर चलाते रहते थे। अब वैज्ञानिकों को शुरुआत से ही ऐसे 5-10 सटीक अणु मिल जाते हैं जिनके सफल होने की संभावना सामान्य से सैकड़ों गुना अधिक होती है। रेजिना बारज़िले और जिम कोलिन्स को मिला प्रित्जकर पुरस्कार इस बात की पुष्टि करता है कि 21वीं सदी की जीवविज्ञान अब केवल टेस्ट ट्यूब तक सीमित नहीं है, बल्कि वह कंप्यूटर एल्गोरिदम के बिना अधूरी है।

निष्कर्ष

विज्ञान का अंतिम उद्देश्य मानव जीवन की रक्षा और उसे बेहतर बनाना है। जब रेजिना बारज़िले ने खुद कैंसर से जूझने के बाद अपने कंप्यूटर साइंस ज्ञान को स्वास्थ्य क्षेत्र में लगाने का फैसला किया था, तब शायद कम ही लोगों ने सोचा होगा कि कंप्यूटर कोडिंग एक दिन इंसानों को सुपरबग्स से बचाने का सबसे बड़ा हथियार बनेगी। जिम कोलिन्स और बारज़िले का यह काम दिखाता है कि जब दो अलग-अलग विषय मिलकर किसी साझा मानवीय संकट पर काम करते हैं, तो परिणाम ऐतिहासिक होते हैं।

क्या आपको लगता है कि भारत के चिकित्सा संस्थानों को अब पारंपरिक लैब रिसर्च के बजाय एआई और डेटा साइंस पर आधारित दवा खोज में अपना बजट तुरंत बढ़ाना चाहिए? अपने विचार हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

MIT के वैज्ञानिकों रेजिना बारज़िले और जिम कोलिन्स को AI आधारित एंटीबायोटिक खोज के लिए प्रतिष्ठित प्रित्जकर प्राइज मिला है। जानिए यह तकनीक सुपरबग्स के खिलाफ कैसे बनेगी ढाल।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
❓ रेजिना बारज़िले और जिम कोलिन्स को किस काम के लिए सम्मानित किया गया है?
MIT के प्रोफेसर रेजिना बारज़िले और जिम कोलिन्स को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डीप लर्निंग मॉडल्स का उपयोग करके नई एंटीबायोटिक दवाओं की सफल खोज के लिए प्रित्जकर प्राइज फॉर एआई एंड साइंस रिसर्च एक्सीलेंस से सम्मानित किया गया है।
❓ AI एंटीबायोटिक दवाओं की पहचान कैसे करता है?
AI मॉडल को लाखों रासायनिक यौगिकों की आणविक संरचना और उनके जैविक प्रभावों पर प्रशिक्षित किया जाता है। यह मॉडल पारंपरिक लैब परीक्षणों के मुकाबले बेहद कम समय में उन अणुओं की पहचान कर लेता है जो खतरनाक बैक्टीरिया को खत्म करने में सक्षम होते हैं।
❓ सुपरबग्स क्या होते हैं और यह खोज क्यों जरूरी है?
सुपरबग्स ऐसे बैक्टीरिया या फंगस होते हैं जिन पर मौजूदा एंटीबायोटिक दवाएं बेअसर हो जाती हैं। समय के साथ बैक्टीरिया में प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने से सामान्य संक्रमण भी जानलेवा बन जाते हैं, इसलिए नई एंटीबायोटिक संरचनाओं की खोज अत्यंत आवश्यक है।
❓ भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र पर इस शोध का क्या असर होगा?
भारत एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस की गंभीर चुनौती से जूझ रहा है। AI-संचालित दवा खोज तकनीक से भारतीय शोध संस्थानों और फार्मा कंपनियों को बेहद कम लागत और कम समय में प्रभावी दवाएं विकसित करने में मदद मिल सकती है।
📚 स्रोत / References
यह लेख ऊपर दिए गए स्रोतों की रिपोर्टिंग पर आधारित है।
🛍️ इस विषय से जुड़े उत्पाद खरीदें (Amazon India)
🛒
डीप लर्निंग और एआई फंडामेंटल्स पुस्तक
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और न्यूरल नेटवर्क की कार्यप्रणाली को गहराई से समझने के लिए उपयोगी संदर्भ पुस्तक।
Amazon पर देखें →
🛒
माइक्रोबायोलॉजी और संक्रामक रोग गाइड
बैक्टीरिया, वायरस और एंटीबायोटिक प्रतिरोध के विज्ञान को विस्तार से जानने के लिए जरूरी किताब।
Amazon पर देखें →
🛒
डिजिटल कंपाउंड माइक्रोस्कोप
छात्रों और विज्ञान प्रेमियों के लिए सूक्ष्म जैविक संरचनाओं का प्रत्यक्ष अध्ययन करने का बेहतरीन उपकरण।
Amazon पर देखें →
* Affiliate links — आपको कोई extra charge नहीं, हमें थोड़ा commission मिलता है
Last Updated: नवंबर 03, 2026
Previous Post
No Comment
Add Comment
comment url

Author Bio

Rohit Kumar

✍️ रोहित कुमार

साइंटिफिक कम्युनिकेटर | एडिटोरियल डायरेक्टर

Vigyan Ki Duniya के संस्थापक। 400+ शोध-आधारित लेखों के साथ विज्ञान और टेक्नोलॉजी को सरल हिंदी में समझाते हैं। सस्टेनेबल इनोवेशन और डेटा-संचालित रिपोर्टिंग में विशेषज्ञ।