NISAR Satellite: ISRO-NASA के सैटेलाइट ने दर्ज किया 60 सेमी जमीनी खिंचाव
कल्पना कीजिए कि रात के सन्नाटे में जब पूरी दुनिया सो रही हो, तब जमीन के हजारों किलोमीटर नीचे की परतें चुपचाप खिसक रही हों। जब कोई शक्तिशाली भूकंप आता है, तो हम सिर्फ ऊपरी तबाही देखते हैं—टूटी सड़कें, ढही इमारतें और घबराए हुए लोग। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भूकंप के ठीक उस पल जमीन वास्तव में कितनी खिसकी? आमतौर पर जब बादल छाए हों या धुंध हो, तो अंतरिक्ष में तैरने वाले सामान्य सैटेलाइट कैमरे असहाय हो जाते हैं। लेकिन भारत और अमेरिका का संयुक्त सैटेलाइट NISAR (NASA-ISRO Synthetic Aperture Radar) इस मामले में अलग साबित हो रहा है। हाल ही में आई रिपोर्ट्स के मुताबिक, NISAR सैटेलाइट ने वेनेजुएला में आए भूकंप के दौरान सतह में 60 सेंटीमीटर तक के जमीनी खिंचाव (ground shift) को सटीकता से मापा है। यही नहीं, नासा जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी (JPL) की रिपोर्ट के अनुसार, इस सैटेलाइट ने पैसिफिक नॉर्थवेस्ट के इलाकों में घने बादलों के पार झांककर बेहद साफ रडार इमेजिंग हासिल की है। आइए समझते हैं कि यह तकनीक कैसे काम करती है और यह भारत तथा पूरे विज्ञान जगत के लिए क्यों इतनी महत्वपूर्ण है।
- ►NISAR सैटेलाइट ने भूकंप से जमीन में 60 सेमी का बदलाव दर्ज किया
- ►यह ISRO और NASA का एक संयुक्त पृथ्वी अवलोकन प्रोजेक्ट है
- ►सिंथेटिक एपर्चर रडार घने बादलों के पार भी सटीक तस्वीरें लेता है
- ►पैसिफिक नॉर्थवेस्ट में बादलों के बावजूद ली गईं साफ रडार तस्वीरें
- ►भारत के हिमालयी क्षेत्रों में भूकंप और भूस्खलन की निगरानी में मददगार
NISAR सैटेलाइट क्या है और यह क्यों अलग है?
जब भी हम किसी सैटेलाइट की बात करते हैं, तो हमारे दिमाग में अंतरिक्ष से ली गई नीले और हरे रंग की सुंदर तस्वीरें आती हैं। लेकिन NISAR सामान्य कैमरों वाला सैटेलाइट नहीं है। यह एक डुअल-फ्रीक्वेंसी सिंथेटिक एपर्चर रडार (SAR) सैटेलाइट है। इसमें दो अलग-अलग रडार तरंगों का इस्तेमाल किया गया है—L-बैंड (जो नासा द्वारा तैयार किया गया है) और S-बैंड (जो हमारी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्था यानी ISRO द्वारा बनाया गया है)।
सामान्य optical कैमरे सूरज की रोशनी और साफ मौसम पर निर्भर होते हैं। यदि नीचे घना कोहरा, धुआं या भारी बारिश वाले बादल हों, तो सामान्य कैमरे ज़मीन को नहीं देख पाते। NISAR का रडार खुद अपनी रेडियो तरंगें पृथ्वी की ओर भेजता है और जब वे तरंगें टकराकर वापस लौटती हैं, तो उनका विश्लेषण करके एक-एक मिलीमीटर के स्तर का नक्शा तैयार करता है। यह वैसा ही है जैसे अंधेरे कमरे में फ्लैशलाइट जलाकर कोई तस्वीर ली जाए।
60 सेमी जमीनी खिंचाव: रडार डेटा ने क्या साबित किया?
हाल ही में वेनेजुएला में जब भूकंप के झटके महसूस किए गए, तो वैज्ञानिकों ने NISAR द्वारा जुटाए गए रडार डेटा का विश्लेषण किया। रिपोर्टों के अनुसार, आंकड़ों से साफ हुआ कि भूकंपीय दबाव के कारण उस इलाके की जमीन अपनी मूल जगह से 60 सेंटीमीटर (लगभग 2 फीट) तक खिसक गई थी।
किसी सामान्य सर्वेक्षण प्रणाली से इतनी जल्दी और इतने बड़े पैमाने पर जमीन के खिंचाव को नापना बेहद मुश्किल होता है। लेकिन NISAR ने अंतरिक्ष से बिना किसी जमीनी बाधा के इस बदलाव को रिकॉर्ड कर लिया। वैज्ञानिक भाषा में इसे 'इन्टरफेरोमेट्री' (Interferometry) तकनीक कहते हैं। इसमें भूकंप आने से पहले की रडार छवि और भूकंप के बाद की रडार छवि की आपस में तुलना की जाती है। दोनों छवियों के बीच जो अंतर आता है, उससे ठीक-ठीक पता चल जाता है कि जमीन किस दिशा में और कितनी दूरी तक खिसकी है।
बादलों के पार देखने की अद्भुत क्षमता
नासा जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी (JPL) द्वारा साझा की गई एक अन्य जानकारी में बताया गया कि NISAR ने पैसिफिक नॉर्थवेस्ट क्षेत्र में लगातार बने घने बादलों के बावजूद वहां की जमीन और जंगलों की तस्वीरें खींचीं। यह क्षेत्र अक्सर घने कोहरे और बादलों से ढका रहता है, जिससे सामान्य सैटेलाइटों के लिए वहां की निगरानी करना एक चुनौती होती है। NISAR के माइक्रोवेव रडार बादलों की बूंदों को आसानी से पार कर जाते हैं और धरातल की असली स्थलाकृति को उजागर कर देते हैं।
साधारण भाषा में समझिए: यह तकनीक कैसे काम करती है?
इसे समझने के लिए एक व्यावहारिक उदाहरण लेते हैं। मान लीजिए आप एक अंधेरे कमरे में खड़े हैं और आपके हाथ में एक चमगादड़ जैसी सोनार क्षमता है। आप ताली बजाते हैं और दीवार से टकराकर लौटने वाली आवाज की गूंज से समझ जाते हैं कि दीवार कितनी दूरी पर है और उसमें कहीं कोई दरार तो नहीं पड़ी।
NISAR भी यही करता है। यह पृथ्वी की तरफ रेडियो तरंगों की एक बौछार भेजता है। जब ये तरंगें पहाड़ों, इमारतों, जंगलों या समुद्र से टकराकर वापस सैटेलाइट तक पहुँचती हैं, तो सैटेलाइट में लगा कंप्यूटर यह हिसाब लगा लेता है कि कौन सी तरंग कितनी देर में वापस आई। यदि जमीन कुछ सेंटीमीटर धंस गई है या ऊपर उठ गई है, तो तरंग के लौटने के समय में अंतर आ जाता है। इसी सूक्ष्म अंतर से पृथ्वी के हिलने का पूरा 3D नक्शा बन जाता है।
भारत के लिए NISAR का महत्व और ISRO का योगदान
हम भारतीयों के लिए यह मिशन बेहद गर्व का विषय है। यह महज अमेरिका का मिशन नहीं है, बल्कि इसमें ISRO की बराबरी की साझेदारी है। ISRO ने NISAR के लिए एडवांस S-बैंड रडार विकसित किया है, जो जमीनी वनस्पति और सतह के बारीक बदलावों को पकड़ने में माहिर है।
भारत के लिए इसके दो सबसे बड़े प्रत्यक्ष लाभ हैं:
1. हिमालयी क्षेत्रों में भूकंप और भूस्खलन की निगरानी
भारत का हिमालयी क्षेत्र दुनिया के सबसे संवेदनशील भूकंपीय क्षेत्रों में से एक है। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और उत्तर-पूर्वी राज्यों में लगातार भूस्खलन और जमीन धंसने की घटनाएं (जैसे जोशीमठ की घटना) देखने को मिलती हैं। NISAR की मदद से भारतीय भूवैज्ञानिक यह पहले ही पता लगा सकेंगे कि किस पहाड़ में कितनी धीमी गति से तनाव बन रहा है या कौन सा इलाका हर साल कुछ मिलीमीटर धंस रहा है।2. मानसूनी आपदाओं और तटीय सुरक्षा में मदद
भारत में मानसून के दौरान अक्सर विशाल बादल छाए रहते हैं और नदियां उफान पर होती हैं। जब बाढ़ आती है, तो ऑप्टिकल सैटेलाइट काम नहीं करते। NISAR अपनी रडार दृष्टि से बादलों और बारिश के बीच भी बाढ़ के पानी के फैलाव और तटीय इलाकों के कटाव का सही डेटा दे सकेगा। इससे आपदा राहत टीमों (NDRF) को समय पर सही जानकारी मिल सकेगी।भविष्य में पृथ्वी विज्ञान और आपदा प्रबंधन की नई राह
NISAR जैसे उपग्रह पृथ्वी अवलोकन (Earth Observation) के मामले में एक नए युग की शुरुआत कर रहे हैं। आने वाले समय में यह सैटेलाइट केवल भूकंप ही नहीं, बल्कि अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड में बर्फ की चोटियों के पिघलने की रफ्तार, ज्वालामुखी विस्फोट से पहले जमीन के फूलने की प्रक्रिया और भूजल के अत्यधिक दोहन से जमीन के धंसने जैसी घटनाओं पर भी नजर रखेगा।
जब वैज्ञानिक हर 12 दिन में पूरी पृथ्वी की सतह का डिजिटल नक्शा तैयार करेंगे, तो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझना कहीं अधिक आसान और सटीक हो जाएगा।
निष्कर्ष: विज्ञान और इंसानियत की सुरक्षा
अंतरिक्ष विज्ञान अब सिर्फ दूर के ग्रहों की खोज तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसका सबसे बड़ा मकसद हमारी अपनी पृथ्वी और इंसानी जान-माल की रक्षा करना है। ISRO और NASA का NISAR सैटेलाइट यह साबित करता है कि जब दो बड़े देश और उनके वैज्ञानिक हाथ मिलाते हैं, तो बादलों के पार छिपे कुदरत के रहस्यों को भी सामने लाया जा सकता है।
क्या आपको लगता है कि इस तरह के एडवांस रडार सैटेलाइट्स की मदद से भविष्य में प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकेगा? अपनी राय और विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें!
ISRO और NASA के संयुक्त NISAR सैटेलाइट ने भूकंप के बाद 60 सेमी जमीनी बदलाव दर्ज किया। जानिए कैसे यह रडार बादलों के पार भी तस्वीरें लेता है।
- ISRO-NASA's NISAR satellite reveals the ground shifted by 60 cm during Venezuela's earthquake: Here's what — The Economic Times
- NASA-ISRO Satellite Captures Pacific Northwest Through Clouds — NASA Jet Propulsion Laboratory (JPL) (.gov)